Wednesday, December 24, 2008

अन्तिम अभिलाषा

लो आज चला इस धरती से , साथी ना मिला कोई धरती पर ।
यदि में अपना सा तुम्हें लगू , तो फूल चढाना अर्थी पर ॥

मेरी ये मौन हड्डियाँ , अब तुमको न बुलाने आएँगी ।
कुछ समझ सको तो आ जाना , वरना युही जल जायेंगी ॥

यूं तो जीवन जला किया , पर आज आखरी ज्वाला है ।
तुम दो आंसू टपका देना , में समझूंगा बरमला है ॥

कुछ बोल न पाउँगा मुँह से , अब लपट चिता की बोलेगी ।
जो छिपा हुआ था जीवन भर , वह भेद तुम्ही से खोलेगी ॥

जल पाकर धुआ उठेगा जब , तुम पढ़ लेना नैनों की भाषा ।
फिर मिलना पुनर्जनम में तुम , ये है मेरी अंतिम अभिलाषा
धन्यबाद